शुक्रवार, 28 जनवरी 2022
मैं कौन हूं?
सोमवार, 24 जनवरी 2022
मनुष्य पोतड़ों में लिपटा एक परमात्मा है।
शुक्रवार, 21 जनवरी 2022
क्रिया योग कैसे करते है?
बुधवार, 28 जुलाई 2021
नारद मोह की कथा
मंगलवार, 27 जुलाई 2021
श्री रामचरितमानस के सुंदरकांड का एक अनूठा प्रसंग
सोमवार, 26 जुलाई 2021
ईश्वर पर भरोसा रखे, वह अवश्य सही समय पर सबकुछ देगा
शुक्रवार, 23 जुलाई 2021
भगवान् श्रीराम के मृग का पीछा करने का सच
गुरुवार, 22 जुलाई 2021
राजा भर्तृहरि की कथा
बुधवार, 21 जुलाई 2021
जीवन का मूल्य क्या है?
मंगलवार, 20 जुलाई 2021
संचित कर्मो का फल
एक दिन एक राजा ने अपने 3 मन्त्रियो को दरबार में बुलाया, और तीनो को आदेश दिया के एक एक थैला ले कर बगीचे में जाएं और वहां से अच्छे अच्छे फल (fruits ) जमा करें वो तीनो अलग अलग बाग़ में प्रविष्ट हो गए पहले मन्त्री ने कोशिश की के राजा के लिए उसकी पसंद के अच्छे अच्छे और मज़ेदार फल जमा किए जाएँ , उस ने काफी मेहनत के बाद बढ़िया और ताज़ा फलों से थैला भर लिया।
दूसरे मन्त्री ने सोचा राजा हर फल का परीक्षण तो करेगा नहीं , इस लिए उसने जल्दी जल्दी थैला भरने में ताज़ा , कच्चे , गले सड़े फल भी थैले में भर लिए तीसरे मन्त्री ने सोचा राजा की नज़र तो सिर्फ भरे हुवे थैले की तरफ होगी वो खोल कर देखेगा भी नहीं कि इसमें क्या है , उसने समय बचाने के लिए जल्दी जल्दी इसमें घास , और पत्ते भर लिए और वक़्त बचाया।
दूसरे दिन राजा ने तीनों मन्त्रियो को उनके थैलों समेत दरबार में बुलाया और उनके थैले खोल कर भी नही देखे और आदेश दिया कि , तीनों को उनके थैलों समेत दूर स्थान के एक जेल में ३ महीने क़ैद कर दिया जाए।
अब जेल में उनके पास खाने पीने को कुछ भी नहीं था सिवाए उन थैलों के तो जिस मन्त्री ने अच्छे अच्छे फल जमा किये वो तो मज़े से खाता रहा और 3 महीने गुज़र भी गए।
फिर दूसरा मन्त्री जिसने ताज़ा , कच्चे गले सड़े फल जमा किये थे, वह कुछ दिन तो ताज़ा फल खाता रहा फिर उसे ख़राब फल खाने पड़े , जिस से वो बीमार होगया और बहुत तकलीफ उठानी पड़ी और तीसरा मन्त्री जिसने थैले में सिर्फ घास और पत्ते जमा किये थे वो कुछ ही दिनों में भूख से मर गया अब आप अपने आप से पूछिये कि आप क्या जमा कर रहे हो ??
आप इस समय जीवन के बाग़ में हैं , जहाँ चाहें तो अच्छे कर्म जमा करें .. चाहें तो बुरे कर्म , कोई देखने वाला नही, सिवाय भगवान के मगर याद रहे जो आप जमा करेंगे वही आपको आखरी समय काम आयेगा क्योंकि दुनिया क़ा राजा आपको चारों ओर से देख रहा है ।
जय जय श्री राधे कृष्ण जी
भक्त कुम्हार और श्री कृष्ण की कथा
एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गई और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी। जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे।भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्हार के पास पहुंचे। कुम्हार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था। लेकिन जैसे ही कुम्हार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। कुम्हार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं। तब प्रभु ने कुम्हार से कहा कि 'कुम्हार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है। मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।
तब कुम्हार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया। कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहां आ गईं और कुम्हार से पूछने लगी - 'क्यूं रे,कुम्हार! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या?'
कुम्हार ने कह दिया - 'नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा।' श्री कृष्ण यह सब बातें बड़े से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे। मैया तो वहां से चली गयीं।अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्हार से कहते हैं - 'कुम्हार जी, यदि मैया चली गई हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।' कुम्हार बोला - 'ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।'
भगवान मुस्कुराये और कहा - 'ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूं। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।'
कुम्हार कहने लगा - 'मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूंगा।'प्रभु जी कहते हैं - 'चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूं। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।अब कुम्हार कहता है - 'बस, प्रभु जी ! एक विनती और है। उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूंगा।'
भगवान बोले - 'वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?'
कुम्हार कहने लगा - 'प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लाई गई है । मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।'भगवान ने कुम्हार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया ।'
प्रभु बोले - 'अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गई, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।'
तब कुम्हार कहता है - 'अभी नहीं, भगवन ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है । उसे भी पूरा कर दीजिए और वह यह है - जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे । बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूंगा।'
कुम्हार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्हार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया ।
फिर कुम्हार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया। उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोए और चरणामृत लिया। अपनी पूरी झोपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गए।
जरा सोचें, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे।
लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर। कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते।
जय श्री राधे कृष्णा
राम से बड़ा राम का नाम क्यों..?
रामदरबार में हनुमानजी महाराज श्री रामजी की सेवा में इतने तन्मय हो गए कि गुरू वशिष्ठ के आने का उनको ध्यान ही नहीं रहा, सबने उठ कर उनका अभिवादन किया लेकिन हनुमानजी नहीं कर पाए।
वशिष्ठ जी ने श्री रामजी से कहा कि राम गुरु का भरे दरबार में अभिवादन नहीं कर अपमान करने पर क्या सजा होनी चाहिए?
श्री रामजी ने कहा गुरुवर आप ही बताएं
वशिष्ठ जी ने कहा:- "मृत्यु दण्ड"
श्रीराम जी ने कहा:- स्वीकार है
तब श्रीराम जी ने कहा:- गुरुदेव आप बताएं कि यह अपराध किसने किया है..
बता दूंगा पर "राम" वो तुम्हारा इतना प्रिय है कि, तुम अपने आप को सजा दे दोगे पर उसको नहीं दे पाओगे
श्रीराम जी ने कहा:- गुरुदेव,राम के लिए सब समान हैं, मैंने सीता जैसी पत्नी का सहर्ष त्याग धर्म के लिए कर दिया....फिर भी आप संशय कर रहे हैं..
नहीं, "राम"! मुझे तुम्हारे उपर पर संशय नहीं है पर, मुझे दण्ड के परिपूर्ण होने पर संशय है.... अत:यदि तुम यह विश्वास दिलाते हो कि,तुम स्वयं उसे मृत्यु दण्ड अपने अमोघ बाण से दोगे तो ही मैं अपराधी का नाम और अपराध बताऊंगा
श्रीराम जी ने पुन: अपना संकल्प व्यक्त कर दिया।
तब वशिष्ठ जी ने बताया कि यह अपराध हनुमान जी ने किया है
हनुमानजी ने भी स्वीकार कर लिया।
तब दरबार में रामजी ने घोषणा की कि कल सांयकाल सरयु के तट पर,हनुमानजी को में स्वयं अपने अमोघ बाण से मृत्यु दण्ड दूंगा
हनुमानजी के घर जाने पर उदासी की अवस्था में माता अंजनी ने देखा तो चकित रह गई कि मेरा लाल महावीर, अतुलित बल का स्वामी, ज्ञान का भण्डार, आज इस अवस्था में।
माता ने बार बार पुछा, पर जब हनुमान चुप रहें तो माता ने अपने दूध का वास्ता देकर पूछा।
तब हनुमानजी ने बताया कि, यह प्रकरण हुआ है अनजाने में...
माता! आप जानती हैं कि हनुमान को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई नहीं मार सकता, पर भगवान श्रीराम के अमोघ बाण से भी कोई बच भी नहीं सकता l
तब "माता" ने कहा:- हनुमान,मैंने भगवान शंकर से, "राम" मंत्र (नाम) प्राप्त किया था ,और तुम्हें भी जन्म के साथ ही यह नाम घुटी में पिलाया।
जिसके प्रताप से तुमने बचपन में ही सूर्य को फल समझ मुख में ले लिया था,उस राम नाम के होते हुए हनुमान कोई भी तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता,चाहे वो राम स्वयं ही क्यों ना हों।
राम नाम की शक्ति के सामने राम की शक्ति और राम के अमोघ शक्तिबाण की शक्तियां महत्वहीन हो जाएंगी। जाओ मेरे लाल,अभी से सरयु के तट पर जाकर राम नाम का उच्चारण करना आरंभ करदो।
माता के चरण छूकर हनुमानजी,सरयु किनारे राम राम राम राम रटने लगे।
सांयकाल,राम अपने सम्पूर्ण दरबार सहित सरयु तट आए....
सबको कोतूहल था कि क्या राम हनुमान को सजा देंगे..
लेकिन जब श्रीराम ने बार बार रामबाण,अपने महान शक्तिधारी,अमोघशक्ति बाण चलाए पर हनुमानजी के ऊपर उनका कोई असर नहीं हुआ तो गुरु वशिष्ठ जी ने शंका जताई:-
राम क्या तुम अपनी पुर्ण निष्ठा से बाणों का प्रयोग कर रहे हो।
तब श्रीराम ने कहा:- हां गुरूदेव, मैं गुरु के प्रति अपराध की सजा देने को अपने बाण चला रहा हूं,उसमें किसी भी प्रकार की चतुराई करके मैं कैसे वही अपराध कर सकता हूं।
तो तुम्हारे बाण अपना कार्य क्यों नहीं कर रहे हॆ
तब श्रीराम ने कहा:- गुरुदेव हनुमान राम राम राम की अंखण्ड रट लगाये हुए है,मेरी शक्तिंयों का अस्तित्व राम नाम के प्रताप के समक्ष महत्वहीन हो रहा है।
इससे मेरा कोई भी प्रयास सफल नहीं हो रहा है,आप ही बताएं गुरु देव ! मैँ क्या करुं।
गुरु देव ने कहा:- हे राम! आज से मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे दरबार को त्याग कर,अपने आश्रम जा रहा हूं जहां राम नाम का निरंतर जप करुंगा
जाते -जाते, गुरुदेव वशिष्ठ जी ने घोषणा की....
हे राम ! मैं जानकर,मानकर,यह घोषणा कर रहा हूं कि स्वयं राम से राम का नाम बडा़ है,राम नाम महाअमोघशक्ति का सागर है।
जो कोई जपेगा,लिखेगा,मनन करेगा,उसकी लोक कामनापूर्ति होते हुए भी,वो मोक्ष का भागी होगा।
मैंने सारे मंत्रों की शक्तियों को राम नाम के समक्ष न्युनतर माना है।
तभी से राम से बडा राम का नाम माना जाता है,वो पत्थर भी तैर जातें है जिन पर श्रीराम का नाम लिखा रहता है।
मेरे प्रभु मेरे श्रीराम
सोमवार, 19 जुलाई 2021
राधारानी जी का पान बीड़ा
तीन साधू थे, यात्रा कर रहे थे यमुना किनारे.!
उसमें तीसरा साधू जो था वो बुढ़ा था, वृद्ध था, उसने कहा "भई हम इस गाँव के बाहर इस मन्दिर में आसन लगा के यहीं रहेंगे,
तुम तो जवान हो, तुम भले जाओ".! तो दो जवान साधू आगे गये!
चलते- चलते संध्या हो गयी दोनों साधुओ ने सोचा अब बरसाना आ रहा है, राधा रानी का गाँव, क्या करेंगे ? मांगेंगे कहाँ ?
बोले मांगना कहाँ अपन तो राधा रानी के मेहमान हैं, खिलाएगी तो खा लेंगे नही तो मन्दिर में आरती के समय कहीं कुछ प्रसाद मिलेगा वो खा के पानी पी लेंगे.!
साधुओ ने मजाक- मजाक में कहा, वो साधू पहुंच गये बरसाना और बरसाना में तो आरती हुई, मन्दिर में उत्सव भी हुआ था.!
साधू बाबा बोले मांगेगें तो नही अपने तो राधा रानी के मेहमान है.! ऐसे करके साधू सो गये.! रात के ११ बजे राधा रानी मंदिर के पुजारी को राधा रानी ने ऐसा जगाया।
राधा रानी बोली "महेमान हमारे भूखे है, तू सो रहा है".!
अरे भई महेमान कौन है.?
दो साधू...
पुजारी के तो होश हवास उड़ गये, ये पुजारी उठे, सोये हुए साधुओ को उठाया "तुम, तुम राधा रानी के मेहमान हो क्या ?
साधु बोले "नही हम तो ऐसे ही,
पुजारी बोले "नही आप बैठो" हाथ-पैर धोये, पत्तले लाये और अच्छे से अच्छा जो राधा रानी के मन्दिर का प्रसाद था,
उत्सव का प्रसाद था जो भी था, लड्डू, रसगुल्ले, खीर-वीर बस टनाटन पक्की रसोई जिमाई.!
वो साधू थोडा टहल के बोले "राधा रानी हमने तो मज़ाक में कहा था तुमने सचमुच में हमको मेहमान बना लिया माँ" हे राधे मैया...
साधू राधा जी का चिंत्तन करते-करते सो गये, तो दोनों साधुओ को एक जैसा सपना आया.!
वो १२ साल की राधा रानी बोलती है, साधू बाबा भोजन तो कर लिया आपने, तृप्त तो हो गये, भूख तो मिट गयी ?
बोले "हाँ,
भोजन अच्छा तो रहा ?
बोले "हाँ,
भोजन, जल आपको सुखद लगे?
बोले "हाँ,
अब कोई और आवश्यकता है क्या ?
बोले "नही-नही मैया
राधा रानी बोली "देखो वो पुजारी डरा-डरा तुमको भोजन तो कराया लेकिन मेरा पान-बीड़े का प्रसाद देना भूल गया,
लो ये मैं पान-बीड़ा देती हूँ आपको.! ऐसा कहकर उसने सिरहाने पर रखा.!
सपने में देख रहे हैं के राधा रानी सिरहाने पान- बीड़ा रख रही हो ऐसा करके उनकी आँख खुल गयी.!
देखा तो सचमुच में पान- बीड़ा दोनों साधुओ के सिरहाने पड़ा है।
जय जय श्री राधे