बुधवार, 14 जुलाई 2021

जगन्नाथ मन्दिर की कथा


















एक बार भगवान श्री कृष्ण सो रहे थे और निद्रावस्था में उनके मुख से राधा जी का नाम निकला। पटरानियों को लगा कि वह प्रभु की इतनी सेवा करती हैं परन्तु प्रभु सबसे ज्यादा राधा जी का ही स्मरण रहता है। रुक्मिणी जी एवं अन्य रानियों ने रोहिणी जी से राधा रानी व श्री कृष्ण के प्रेम व ब्रज-लीलाओं का वर्णन करने की प्रार्थना की। माता ने कथा सुनाने की हामी तो भर दी लेकिन यह भी कहा कि श्री कृष्ण व बलराम को इसकी भनक न मिले।

तय हुआ कि सभी रानियों को रोहिणी जी एक गुप्त स्थान पर कथा सुनाएंगी। वहाँ कोई और न आए इसके लिए सुभद्रा जी को पहरा देने के लिए मना लिया गया। सुभद्रा जी को आदेश हुआ कि स्वयं श्री कृष्ण या बलराम भी आएँ तो उन्हें भी अन्दर न आने देना। माता ने कथा सुनानी आरम्भ की। सुभद्रा द्वार पर तैनात थीं।


थोड़ी देर में श्री कृष्ण एवं बलराम वहाँ आ पहुँचे। सुभद्रा ने अन्दर जाने से रोक लिया। इससे भगवान श्री कृष्ण को कुछ सन्देह हुआ। वह बाहर से ही अपनी सूक्ष्म शक्ति द्वारा अन्दर की माता द्वारा वर्णित ब्रज लीलाओं को आनन्द लेकर सुनने लगे। बलराम जी भी कथा का आनन्द लेने लगे। 

कथा सुनते-सुनते श्री कृष्ण, बलराम व सुभद्रा के हृदय में ब्रज के प्रति अद्भुत प्रेम भाव उत्पन्न हुआ। उस भाव में उनके पैर-हाथ सिकुड़ने लगे जैसे बाल्य काल में थे। तीनों राधा जी की कथा में ऐसे विभोर हुए कि मूर्ति के समान जड़ प्रतीत होने लगे। बड़े ध्यान पूर्वक देखने पर भी उनके हाथ-पैर दिखाई नहीं देते थे। सुदर्शन ने भी द्रवित होकर लम्बा रूप धारण कर लिया। उसी समय देवमुनि नारद वहाँ आ पहुँचे। भगवान के इस रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो गए और निहारते रहे।

कुछ समय बाद जब तंद्रा भंग हुई तो नारद जी ने प्रणाम करके भगवान श्री कृष्ण से कहा, "हे प्रभु ! मेरी इच्छा है कि मैंने आज जो रूप देखा है, वह रूप आपके भक्त जनों को पृथ्वी लोक पर चिरकाल तक देखने को मिले। आप इस रूप में पृथ्वी पर वास करें।" भगवान श्री कृष्ण नारद जी की बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा। कलिकाल में मैं इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र में अपना स्वरूप प्रकट करुँगा। कलियुग आगमन के उपरान्त प्रभु की प्रेरणा से मालव राज इन्द्रद्युम्न ने भगवान श्रीकृष्ण, बलभद्रजी और बहन सुभद्राजी की ऐसी ही प्रतिमा जगन्नाथ मन्दिर में स्थापित कराईं। ||श्री राधे राधे||

खुश कैसे रहें??


आज का प्रभू संकीर्तन।सभी खुश रहना चाहते हैं,सभी जानते हैं, जीवन अनिश्चित है।फिर भी हम जीवन से सन्तुष्ट नही।क्योंकि जो सामने वाले के पास है, वो मेरे पास नही।अथवा जो हैं उससे ज्यादा क्यो नही?इसे पाने में ही जीवन का सारा सुख,चैन हम गंवा देते हैं।फिर भी अंततः हम सुखी नही हो पाते।क्योंकि हमें एक से दो,दो से चार और चार से शतक और उससे भी आगे का एकत्रित करना है।पढिये कथा। एक सम्राट का नाई था, जो उसकी मालिश करता, हजामत बनाता।  नाई हमेशा प्रसन्न, बड़ा आनंदित, बड़ा मस्त रहता था। उसको एक रुपया रोज मालिश के बदले मिलता था। बस, एक रुपया रोज में वह खूब खाता-पीता, मित्रों को भी खिलाता पिलाता। उसके पास एक पैसा भी न बचता वह निश्चिन्त हो कर सोता। वह बड़ा खुश था! इतना खुश था कि सम्राट को उससे ईर्ष्या होने लगी।

सम्राट भी इतना खुश नहीं था।  चिंताओं के बोझ और पहाड़ उसके सिर पर थे। 

एक दिन उसने पूछा नाई से कि तेरी प्रसन्नता का राज क्या है? उसने कहा, मैं तो कुछ जानता नहीं, मैं कोई बड़ा बुद्धिमान नहीं। लेकिन, जैसे आप मुझे प्रसन्न देख कर चकित होते हो, मैं आपको देख कर चकित होता हूं कि आपके दुखी होने का कारण क्या है? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है और मैं सुखी हूं, आपके पास सब है, और आप सुखी नहीं! 

सम्राट ने एक दिन अपनी समस्या वजीर से बताई कि यह नाई इतना प्रसन्न है कि मेरे मन में ईर्ष्या की आग जलती है। मुझ से तो बेहतर नाई ही है। वजीर ने कहा, आप घबराए मत। मैं उस नाई को दुरुस्त किए देता हूं। वजीर ने निन्यानबे रुपये थैली में रख कर एक रात नाई के घर में फेंक दिया। जब सुबह नाई उठा, तो उसने थैली में रुपये देखे और गिने तो वो निन्यानबे रुपये  थे। बस वह चिंतित हो गया। उसने कहा,आज जो एक रुपया मिलेगा,वह खर्च नही करूँगा।आज उपवास रख लूंगा।और उससे , सौ रुपये पूरे कर लूँगा।

बस, उसके शांत और सन्तुष्ट मन मे उपद्रव शुरू हो गया।  

कल की उसने कभी चिंता ही न की थी। ‘कल’ उसके मन में कभी छाया ही न डालता था; वह आज में ही जीया था।

आज पहली दफा उसके दिमाग मे  ‘कल’ का प्रश्न उठा। निन्यानबे पास में थे, सौ करने में देर ही क्या थी! सिर्फ एक दिन तकलीफ उठानी थी कि सौ हो जाएंगे। उसने दूसरे दिन उपवास कर लिया।  जब दूसरे दिन वह  सम्राट के पैर दबाने आया, तो वह मस्ती न थी, उदास था, चिंता में पड़ा था, कोई गणित चल रहा था। सम्राट ने पूछा, आज बड़े चिंतित मालूम होते हो? मामला क्या है?

.उसने कहा: नहीं हजूर, कुछ भी नहीं, कुछ नहीं। सब ठीक है।सम्राट ने अनुभव किया कि आज बात में वह सुगंध न थी जो सदा होती थी। ‘सब ठीक है’--ऐसे कह रहा था जैसे सभी कहते हैं, सब ठीक है। जब पहले कहता था तो सब ठीक था ही। आज औपचारिक कह रहा था।

सम्राट ने कहा, नहीं मैं न मानूंगा। तुम उदास दिखते हो, तुम्हारी आंख में रौनक नहीं। तुम रात  ठीक से सोए नही ?

उसने कहा, अब आप पूछते हैं, तो आपसे झूठ कैसे बोलूं! रात  सो नही पाया। लेकिन सब ठीक हो जाएगा, एक दिन की बात है। आप घबराए मत। 

लेकिन यह चिंता उसकी रोज बढ़ती ही गई। सौ पूरे हो गए, तो वह दो सौ पूरे करने की चिंता करने लगा।दस दिन में ही उसकी खुशियां बिखर गई।

सम्राट ने कहा, अब तू बता ही दे सच-सच, मामला क्या है? मेरे वजीर ने कुछ किया है?

तब वह चौका। नाई बोला, क्या मतलब? आपका वजीर...? 

अच्छा, तो अब मैं समझा। अचानक मेरे घर में एक थैली पड़ी मिली मुझे,उसमें निन्यानवे रुपए थे। बस, उसी दिन से मैं मुश्किल में पड़ गया हूं।इस निन्यानबे के फेर ने मेरी सारी खुशियां छीन ली। तो महाराज आप से मेरी खुशी देखी नही जा रही थी,मुझे भी स्वयं की तरह दुखी बना दिया।यही और और कि चाह में हम सब डूबे है। 

||जय जय श्री राधेकृष्ण जी||

अपने मालिक पर विश्वास


 एक अमीर इन्सान था,उसने समुद्र में अकेले धूमने के लिए एक नाव बनवाई छुट्टी के दिन वह नाव लेकर समुद्र की सैर करने निकला।आधे समुद्र तक पहुंचा ही था कि अचानक एक जोरदार तुफान आया

उसकी नाव पूरी तरह से तहस-नहस हो गई लेकिन वह लाईफ जैकेट की मदद से समुद्र में कूद गया।जब तूफान शांत हुआ तब वह तैरता-तैरता एक टापू पर पहुंचा लेकिन वहाँ भी कोई नहीं था।टापू के चारों और समुद्र के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। 

 उस आदमी ने सोचा कि जब मैने पूरी जिंदगी में किसी का भी बुरा नहीं किया तो मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ ?

उस इंसान को लगा कि ईश्वर ने मौत से बचाया तो आगे का रास्ता भी वो ही बताएगा। धीरे-धीरे वह वहाँ पर उगे झाड़-फल-पत्ते खाकर दिन बिताने लगा। अब धीरे-धीरे उसकी आस टूटने लगी,ईश्वर पर से उसका यकीन उठने लगा।फिर उसने सोचा कि अब पूरी जिंदगी यही इस टापू पर ही बितानी है तो क्यों न एक झोपडी बना लूँ. . . . ?

फिर उसने झाड़ की डालियों और पत्तों से एक छोटी सी झोपड़ी बनाई।उसने मन ही मन कहा कि आज से झोपड़ी में सोने को मिलेगा आज से बाहर नहीं सोना पडेगा।रात हुई ही थी कि अचानक मौसम बदला बिजलियाँ जोर-जोर से कडकने लगी,तभी अचानक एक बिजली उस झोपड़ी पर आ गिरी और झोपड़ी धधकते हुए जलने लगी।यह देखकर वह इंसान टूट गया।आसमान की तरफ देखकर बोला है भगवान ये तेरा कैसा इंसाफ है ?तूने मुझ पर अपनी रहम की नजर क्यूँ नहीं की ?फिर वह इंसान हताश होकर सर पर हाथ रखकर रो रहा था,कि अचानक एक नाव टापू के पास आई।नाव से उतरकर दो आदमी बाहर आये और बोले कि हम तुम्हें बचाने आये हैं।दूर से इस वीरान टापू में जलता हुआ झोपडा़ देखा तो लगा कि कोई उस टापू पर मुसीबत में हैं।अगर तुम अपनी झोपड़ी नहीं जलाते तो हमे पता नहीं चलता कि टापू पर कोई हैं।उस आदमी की आखों से आसूं गिरने लगे।

उसने ईश्वर से माफी मांगी और बोला कि है भगवान मुझे क्या पता था कि तूने मुझे बचाने के लिए मेरी झोपड़ी जलाई थी

यकीनन तू अपने भक्तों का हमेशा ख्याल रखता है।तूने मेरे सब्र का इम्तेहान लिया लेकिन मैं उसमें फेल हो गया।मुझे माफ कर दें।

 वो ईश्वर अपने भक्तों से दूर नहीं हैं।उसे सब पता है कि अपने भक्तों को कब और कैसे देना है,उसकी रहमतों की बरसात तो हर पल, हर घड़ी चौबीसों घंटे हो रही हैं बस कमी हैं तो हमारे विश्वास की।हमारा विश्वास ही है जो डगमगा जाता हैं। जब एक सांसारिक पिता ही अपने बच्चे को दुख तकलीफों में नहीं देख सकता हैं तो जिस पिता ने इस सृष्टि की रचना की हैं वो भला कैसे अपने बच्चों को बीच मझदार में छोड़ सकता हैं।

दिन चाहे सुख के हो या दुख के,प्रभु अपने भक्तों के साथ हमेशा रहता हैं।

जाने -अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे कर सकते हैं?


हम सभी से जाने - अनजाने में बहुत पाप हो जाते है जिसके बारे में कभी कभी हमे पता भी नहीं चलता के हमसे क्या पाप हो गया है। तो हम किस प्रकार उस पाप का प्रायश्चित कर सकते है ।

बहुत सुन्दर प्रश्न है ,यदि हमसे अनजाने में कोई पाप हो जाए तो क्या उस पाप से मुक्ती का कोई उपाय है।

श्रीमद्भागवत जी के षष्ठम स्कन्ध में , महाराज परीक्षित जी ,श्री शुकदेव जी से ऐसा प्रश्न कर लिए।

बोले भगवन - आपने पञ्चम स्कन्ध में जो नरको का वर्णन किया ,उसको सुनकर तो गुरुवर रोंगटे खड़े जाते हैं।

प्रभूवर मैं आपसे ये पूछ रहा हूँ की यदि कुछ पाप हमसे अनजाने में हो जाते हैं ,जैसे चींटी मर गयी,हम लोग स्वास लेते हैं तो कितने जीव श्वासों के माध्यम से मर जाते हैं। भोजन बनाते समय लकड़ी जलाते हैं ,उस लकड़ी में भी कितने जीव मर जाते हैं । और ऐसे कई पाप हैं जो अनजाने हो जाते हैं ।

तो उस पाप से मुक्ती का क्या उपाय है भगवन ।

आचार्य शुकदेव जी ने कहा राजन ऐसे पाप से मुक्ती के लिए रोज प्रतिदिन पाँच प्रकार के यज्ञ करने चाहिए ।

महाराज परीक्षित जी ने कहा, भगवन एक यज्ञ यदि कभी करना पड़ता है तो सोंचना पड़ता है ।आप पाँच यज्ञ रोज कह रहे हैं । -

यहां पर आचार्य शुकदेव जी हम सभी मानव के कल्याणार्थ कितनी सुन्दर बात बता रहे हैं ।

बोले राजन पहली यज्ञ है -जब घर में रोटी बने तो पहली रोटी गऊ ग्रास के लिए निकाल देना चाहिए ।

दूसरी यज्ञ है राजन -चींटी को दस पाँच ग्राम आटा रोज वृक्षों की जड़ो के पास डालना चाहिए।

तीसरी यज्ञ है राजन्-पक्षियों को अन्न रोज डालना चाहिए ।

चौथी यज्ञ है राजन् -आँटे की गोली बनाकर रोज जलाशय में मछलियो को डालना चाहिए ।

पांचवीं यज्ञ है राजन् भोजन बनाकर अग्नि भोजन , रोटी बनाकर उसके टुकड़े करके उसमे घी चीनी मिलाकर अग्नि को भोग लगाओ। राजन् अतिथि सत्कार खूब करें, कोई भिखारी आवे तो उसे जूठा अन्न कभी भी भिक्षा में न दे ।

राजन् ऐसा करने से अनजाने में किये हुए पाप से मुक्ती मिल जाती है। हमे उसका दोष नहीं लगता ।उन पापो का फल हमे नहीं भोगना पड़ता।

राजा ने पुनः पूछ लिया ,भगवन यदि गृहस्त में रहकर ऐसी यज्ञ न हो पावे तो और कोई उपाय हो सकता है क्या। तब यहां पर श्री शुकदेव जी कहते हैं

कर्मणा कर्मनिर्हांरो न ह्यत्यन्तिक इष्यते।

अविद्वदधिकारित्वात् प्रायश्चितं विमर्शनम् ।।

नरक से मुक्ती पाने के लिए हम प्रायश्चित करें। कोई व्यक्ति तपस्या के द्वारा प्रायश्चित करता है। कोई ब्रह्मचर्य पालन करके प्रायश्चित करता है। कोई व्यक्ति यम,नियम,आसन के द्वारा प्रायश्चित करता है। लेकिन मैं तो ऐसा मानता हूँ राजन्!

केचित् केवलया भक्त्या वासुदेवपरायणः 

राजन् केवल हरी नाम संकीर्तन से ही जाने और अनजाने में किये हुए को नष्ट करने की सामर्थ्य है। इसलिए सदैव कहीं भी कभी भी किसी भी समय सोते जागते उठते बैठते राम नाम रटते रहो।

भक्ति सम्पन्न करने की नौ विधियाँ

 


श्रवणं: भगवान के पवित्र नाम को सुनना भक्ति का शुभारम्भ है | श्रीमद् भागवतम के पाठ को सुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्रवण विधि है | श्रवण से प्रारम्भ करके भक्ति द्वारा ही मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान तक पहुँच सकता है  परीक्षित महाराज ने केवल श्रवण से मोक्ष प्राप्त किया |

कीर्तनं: भगवान् के पवित्र नाम का सदैव कीर्तन करना | चैतन्य महाप्रभु ने संस्तुति की है: “कलह तथा कपट के इस युग में उद्धार का एक मात्र साधन भगवान् के नाम का कीर्तन है | कोई अन्य उपाय नहीं है, कोई अन्य उपाय नहीं है, कोई अन्य उपाय नहीं है | निरपराध होकर हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करने मात्र से सारे पाप-कर्म दूर होजाते हैं और भगवतप्रेम की कारणस्वरूपा शुद्ध भक्ति प्रकट होती है ,भगवान का पवित्र नाम भगवान के ही समान शक्तिमान है, अतः भगवान के नाम के कीर्तन तथा श्रवण-मात्र से लोग दुर्लघ्य मृत्यु को शीघ्र ही पार कर लेते हैं  शुकदेव गोस्वामी जी ने केवल कीर्तन से मोक्ष प्राप्त किया |

स्मरणं: श्रवण तथा कीर्तन विधियों को नियमित रूप से संपन्न करने तथा अंत:करण को शुद्ध कर लेने के बाद स्मरण की संस्तुति की गयी है | मनुष्य को स्मरण की सिद्धि तभी मिलती है जब वह निरन्तर भगवान के चरण कमलों का चिंतन करता है | भक्तियोग का मूल सिद्धांत है भगवान के विषय में निरंतर चिंतन करना, चाहे कोई किसी तरह से भी चिंतन करे | प्रह्लाद महाराज ने भगवान के निरन्तर स्मरण से मोक्ष प्राप्त किया |

पाद-सेवनम: भगवान के चरण कमलों के चिंतन में गहन आसक्ति होने को पाद-सेवनम कहते हैं | वैष्णव, तुलसी, गंगा तथा यमुना की सेवा, पाद-सेवनम में शामिल है | लक्ष्मी जी ने भगवान के चरण कमलों की सेवा कर के सिद्धि प्राप्त की |

अर्चनं: अर्चनं अर्थात भगवान के अर्चाविग्रह  की पूजा | अर्चाविग्रह  की पूजा अनिवार्य है | प्रथु महाराज ने भगवान के अर्चाविग्रह  की पूजा कर के मोक्ष प्राप्त किया |

वन्दनं: भगवान की वंदना या स्तुति करना | अक्रूरजी ने वंदना के द्वारा मोक्ष प्राप्त किया |

दास्यम: दास के रूप में भगवान की सेवा करना | हनुमान जी ने भगवान राम की सेवा कर के मोक्ष प्राप्त किया|


साख्यं: मित्र के रूप में भगवान की पूजा करना | सखा शब्द प्रगाढ़ प्रेम का सूचक है | अर्जुन ने भगवान से मैत्री स्थापित कर के मोक्ष प्राप्त किया 

आत्मनिवेदनम: जब भक्त अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित कर देता है और हर कार्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए करता है, यह अवस्था आत्मनिवेदनम है | आत्मनिवेदनम का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बलि महाराज तथा अम्बरीष महाराज का है | आत्मसमर्पण करने के फलस्वरूप भगवान बलि महाराज के द्वारपाल बन गये तथा उन्होंने सुदर्शन चक्र को अम्बरीष महाराज की सेवा में नियुक्त कर दिया |

भक्ति सम्पन्न करने की नौ संस्तुत विधियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि इन विधियों में कृष्ण तथा उनके प्रति प्रेम प्रदान करने की महान शक्ति निहित है | भक्ति का फल जीवन का चरम लक्ष्य भगवत्प्रेम है  | श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है: “जब मनुष्य श्रवण, कीर्तन से आरम्भ होने वाली इन नौ विधियों से कृष्ण की प्रेममयी सेवा करता है, तब उसे सिद्धि का पाँचवां पद एवं जीवन के लक्ष्य की सीमा भगवत्प्रेम की प्राप्ति होती है”   | जब कोई व्यक्ति भक्ति में स्थिर हो जाता है, तो चाहे एक विधि को सम्पन्न करे या अनेक विधियों को, उसमे भगवत्प्रेम जागृत हो जाता है  | वह भी श्री कृष्ण को प्रसन्न कर सकता है, जिस प्रकार उपरोक्त ने किया है |

||जय जय श्री राधे राधे ||

अक्षय तृतीया पौराणिक महात्म्य एवं शीघ्र विवाह और धन प्राप्ति के लिए शुभ उपाय

हिन्दुओ के प्रमुख त्योहार में से एक अक्षय तृतीया शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है और इसे ही अक्षय तृतिया कहते हैं,  यह सनातन धर्मियों का प्रधान त्यौहार है, इस दिन दिये हुए दान और किये हुए स्त्रान, होम, जप आदि सभी कर्मोंका फल अनन्त होता है - सभी अक्षय (जिसका क्षय या नाश ना हो) हो जाते हैं ; इसी से इसका नाम अक्षय हुआ है।


अक्षय तृतीया अभिजीत मुहुर्त
स्वयंसिद्ध साढेतीन मुहूर्त के रुप में अक्षय तृतीया का बहुत अधिक महत्व है। धर्म शास्त्रों में इस पुण्य शुभ पर्व की कथाओं के बारे में बहुत कुछ विस्तार पूर्वक कहा गया है. इनके अनुसार यह दिन सौभाग्य और संपन्नता का सूचक होता है. दशहरा, धनतेरस, देवउठान एकादशी की तरह  अक्षय तृतीया  को अभिजीत, अबूझ मुहुर्त या सर्वसिद्धि मुहूर्त भी कहा जाता है. क्योंकि इस दिन किसी भी शुभ कार्य करने हेतु पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती. अर्थात इस दिन किसी भी शुभ काम को करने के लिए आपको मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता  नहीं होती. अक्षय अर्थात कभी कम ना होना वाला इसलिए मान्यता अनुसार इस दिन किए गए कार्यों में शुभता प्राप्त होती है. भविष्य में उसके शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।

हिन्दू समुदाय के अतिरिक्त जैन धर्म के लोग भी इस तिथि को बहुत महत्व देते है। इस दिन बिना पंचांग या शुभ मुहूर्त देखे आप हर प्रकार के मांगलिक कार्य जैसे विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, वस्त्र आभूषण आदि की खरीदारी, जमीन या वाहन खरीदना आदि को कर सकते है। पुराणों में इस दिन पितरों का तर्पण, पिंडदान या अन्य किसी भी तरह का दान अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा में स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते है। इतना ही नहीं इस दिन किये जाने वाला जप, तप, हवन, दान और पुण्य कार्य भी अक्षय हो जाते है।

आज के दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों उच्च राशि मे होते है।अतः मन और आत्मा दोनों से बलवान रहते है,तो आज आप जो भी कार्य करते है वो मन और आत्मा से जुड़ा रहता है ऐसे में आज का किया पूजा पाठ और दान पुण्य बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावी होते है।

इसी तिथि को नर - नारायण, परशुराम और हयग्रीव - अवतार हुए थे; इसलिये इस दिन उनकी जयन्ती मनायी जाती है तथा इसी दिन त्रेतायुग भी आरम्भ हुआ था, अतएव इसे मध्याह्न व्यापिनी ग्रहण करना चाहिये, परंतु परशुरामजी प्रदोष काल में प्रकट हुए थे; इसलिये यदि द्वितीया को मध्याह्नसे पहले तृतीया आ जाये तो उस दिन अक्षयतृत्तीया, नर - नारायण जन्मोत्सव, परशुराम जन्मोत्सव और हयग्रीव जन्मोत्सव सब सम्पन्न की जा सकती हैं और यदि द्वितीया अधिक हो तो परशुराम - जन्मोत्सव दूसरे दिन होता है। यदि इस दिन गौरीव्रत भी हो तो ' गौरी विनायकोपेता ' के अनुसार गौरीपुत्र गणेशकी तिथि चतुर्थीका सहयोग अधिक शुभ होता है। अक्षयतृत्तीया बड़ी पवित्र और महान् फल देनेवाली तिथि है,  इसलिये इस दिन सफलता की आशा से व्रतोत्सवादिके अतिरिक्त वस्त्र, शस्त्र और आभूषणादि बनवाये अथवा धारण किये जाते है तथा नवीन स्थान, संस्था एवं समाज वर्षकी तेजी - मंदी जाननेके लिये इस दिन सब प्रकारके अन्न, वस्त्र आदि व्यावहारिक वस्तुओं और व्यक्तिविशेषोंके नामोंको तौलकर एक सुपूजित स्थानमें रखते हैं और दूसरे दिन फिर तौलवर उनकी न्यूनाधिकता से भविष्य का शुभाशुभ मालूम करते हैं, अक्षयतृत्तीया में तृत्तीया तिथि, सोमवार और रोहिणी नक्षत्र ये तीनों हों तो बहुत श्रेष्ठ माना जाता है, किसान लोग उस दिन चन्द्रमाके अस्त होते समय रोहिणी का आगे जाना अच्छा और पीछे रहे जाना बुरा मानते हैं।

स्त्रात्वा हुत्वा च दत्त्वा च जप्त्वानन्तफलं लभेत् !! ( भारते )

यत्किञ्चिद् दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु !
तत् सर्वमक्षयं यस्मात् तेनेयमक्षया स्मृता !!

जैनियों में अक्षय तृतीया की मान्यताएँ 
हिंदुओं के साथ साथ जैन समुदाय में भी अक्षय तृतीया का महत्व है. जैन धर्म में यह दिन उनके प्रथम चौबीस तीर्थंकर में से एक, भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है. ऋषभदेव ही बाद में जा कर भगवान आदिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए. ऋषभदेव जैनी भिक्षु थे. इन्होंने ही जैन धर्म में“आहराचार्य– जैनी साधुओं तक आहार (भोजन) पहुंचाने का तरीका” प्रचारित किया था। जैनी भिक्षु कभी खुद के लिए भोजन नहीं पकाते तथा कभी भी किसी से कुछ नहीं मांगते, जो कुछ भी उन्हें लोग प्रेम से दे देते, वे उसे खा लेते.अक्षय तृतीया के पीछे जैन समुदाय में बहुत ही रोचक कथा है. ऋषभदेव ने अपना राज्य पाठ अपने 101 पुत्रों के बीच बाँटते हुए संसार की मोह माया त्याग दी. उन्होने छः महीने तक बिना भोजन तथा पानी के तपस्या की और फिर उसके बाद वे भोजन की आवश्यकता में ध्यान से बाहर बैठ गए. यह जैनी संत आहार की प्रतीक्षा करने लगे। लोगों ने ऋषभदेव को राजा समझकर उन्हें सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात, हाथी, घोड़े, कपड़े और कुछ ने तो अपने राजा को खुश करने के लिए अपनीपुत्री तक दान में दे दी। परंतु ऋषभदेव को यह सब नहीं चाहिए था, वे तो सिर्फ भोजन के एक कौर की चाह में थे. इसलिए ऋषभदेव फिर से एक साल की तपस्या के लिए चले गए और उन्हें सालभर तक उपवास रखना पड़ा. फिर एक साल बाद राजा श्रेयांश हुए जिन्होने अपने “पूर्व-भाव-स्मरण” (पिछले जन्म के विचार जानने की शक्ति) से ऋषभदेव के मन की बात समझी और उनका उपवास तुड़वा कर उन्हें गन्ने का रस पिलाया. यह दिन अक्षय तृतीया का दिन था. उस दिन से आजतक तीर्थंकर ऋषभदेवके उपवास का महत्व समझते हुए जैन समुदाय अक्षय तृतीया के दिन उपवास रखकर गन्ने के रस से अपना उपवास खतम करते हैं. इस प्रथा को“पारणा”कहते हैं।

राशि के अनुसार करें इसकी खरीदारी
मेष: सोना, पीतल। 
वृष: चांदी, स्टील। 
मिथुन: सोना, चांदी , पीतल। 
कर्क: चांदी, वस्त्र। 
सिंह: सोना, तांबा। 
कन्या: सोना, चांदी, पीतल।
तुला: चांदी, इलेक्ट्रॉनिक्स, फर्नीचर। 
वृश्चिक: सोना, पीतल। 
धनु: सोना, पीतल, फ्रिज, वाटर कूलर। 
मकर: सोना, पीतल, चांदी, स्टील। 
कुंभ: सोना, चांदी, पीतल, स्टील, वाहन। 
मीन: सोना, पीतल, पूजन सामग्री व बर्तन।


अक्षय तृतीया की पौराणिक प्रचलित कथा
अक्षय तृतीया की अनेक व्रत कथाएँ प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसकी सदाचार, देव और ब्राह्मणों के प्रति काफी श्रद्धा थी। इस व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने इस पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी। अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के बावजूद भी उसने उपवास करके धर्म-कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान व पूजन के कारण वह बहुत धनी प्रतापी बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ और महान वैभवशाली होने के बावजूद भी वह धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।

स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाखशुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में इस तिथि को परशुराम जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान परशुराम के आविर्भाव की कथा भी सुनी जाती है। इस दिन परशुराम जी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देने का बड़ा माहात्म्य माना गया है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ और क्वारी कन्याएँ इस दिन गौरी-पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुए चने बाँटती हैं, गौरी-पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि लेकर दान करती हैं। मान्यता है कि इसी दिन जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म हुआ था। एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था। जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र चले गए। अपने साथ एक फरसा रखते थे तभी उनका नाम परशुराम पड़ा।

अन्य सौभाग्य वर्धक उपाय
1) आकस्मिक धन प्राप्ति के लिए अक्षय तृतीया से प्रारंभ करते हुए माता लक्ष्मी के मंदिर में प्रत्येक शुक्रवार धूपबत्ती व गुलाब की अगरबत्ती दान करने से जीवन में अचानक धन प्राप्ति के योग बनते 

2) धनधान्य की वृद्धि के लिए अक्षय तृतीया को एक मुट्ठी बासमती चावल सर से 11 बार ऊसर कर बहते हुए जल में श्री महालक्ष्मी का ध्यान करते हुए व श्री मंत्र का जप करते हुए जल प्रवाह कर दें। आश्चर्यजनक लाभ होगा।

3) ऋण से मुक्ति के लिए अक्षय तृतीया पर कनकधारा यंत्र की लाल वस्त्र पर पूजा घर में स्थापना करें। पंचोपचार से पूजा करें। 51 दिन तक श्रद्धा से यंत्र का पाठ करें। धीरे-धीरे ऋण कैसे उतर गया, यह पता भी न चलेगा।

4) स्फटिक के श्रीयंत्र को पंचोपचार पूजन द्वारा विधिवत स्थापित करें। माता लक्ष्मी का ध्यान करें, श्रीसूक्त का पाठ करें।

5) जितना संभव हो सके, मंत्र ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नयै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात् का कमलगट्टे की माला से नियमित जप करें। नियमित रूप से एक गुलाब अर्पित करते रहें।
इस प्रकार पूजा करके ऐसे श्रीयंत्र को आप इस दिन व्यावसायिक स्थल पर भी स्थापित कर सकते हैं। माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

6) अक्षय तृतीया का व्रत रखकर और गर्मी में निम्न वस्तुओं जैसे- छाता, दही, जूता-चप्पल, जल का घड़ा, सत्तू, खरबूजा, तरबूज, बेल का सरबत, मीठा जल, हाथ वाले पंखे, टोपी, सुराही आदि वस्तुओं का दान करने से भाग्योन्नति में बाधा पहुचाने वाली समस्याओं से मुक्ति मिलती है।

7) अक्षय तृतीया के दिन 11 कौड़ियों को लाल कपडे में बांधकर पूजा स्थान में रखने से देवी लक्ष्मी आकर्षित होती हैं। देवी लक्ष्मी के समान ही कौड़ियां भी समुद्र से उत्पन्न हुई हैं।

अक्षय तृतीया के विषय मे अन्य रोचक जानकारी
मान्यता के अनुसार त्रेता युग के शुरू होने पर धरती की सबसे पावन माने जानी वाली गंगा नदी इसी दिन स्वर्ग से धरती पर आई. गंगा नदी को भागीरथ धरती पर लाये थे. इस पवित्र नदी के धरती पर आने से इस दिन की पवित्रता और बढ़ जाती है और इसीलिए यह दिन हिंदुओं के पावन पर्व में शामिल है. इस दिन पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं।
यह दिन पृथ्वी के रक्षक श्री विष्णुजी को समर्पित है. हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार विष्णुजी ने श्री परशुराम के रूप में धरती पर अवतार लिया था. इस दिन परशुराम के रूप में विष्णुजी छटवी बार धरती पर अवतरित हुए थे, और इसीलिए यह दिन परशुराम के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार विष्णुजी त्रेता एवं द्वापरयुग तक पृथ्वी पर चिरंजीवी (अमर) रहे. परशुराम सप्तऋषि में से एक ऋषि जमदगनी तथा रेणुका के पुत्र थे. यह ब्राह्मण कुल में जन्मे और इसीलिए अक्षय तृतीय तथा परशुराम जयंती को सभी हिन्दू बड़े धूमधाम से मनाते हैं।

•यह दिन रसोई एवं पाक (भोजन) की देवी माँ अन्नपूर्णा का जन्मदिन भी माना जाता है. अक्षय तृतीया के दिन माँ अन्नपूर्णा का भी पूजन किया जाता है और माँ से भंडारे भरपूर रखने का वरदान मांगा जाता है. अन्नपूर्णा के पूजन से रसोई तथा भोजन में स्वाद बढ़ जाता है।

महाभारत में अक्षय तृतीया की एक और कथा प्रचलित है. इसी दिन दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण किया था. द्रौपदी को इस चीरहरण से बचाने के लिए श्री कृष्ण ने कभी न खत्म होने वाली साड़ी का दान किया था।

•सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ भी इसी दिन हुआ था ।
•ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी अक्षयतृतीया के दिन हुआ था ।

•प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट अक्षयतृतीया के दिन खोला जाता है। बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल अक्षयतृतीया ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है।



क्यो नहीं लाए थे हनुमान लंका से सीता को??


हनुमान ने एक ही छलांग में समुद्र को पार कर लिया था। जब अहिरावण पाताल लोक में राम-लक्ष्मण का अपहरण करके ले गया था, तब हनुमानजी ने पाताल लोक जाकर अहिरावण का वध कर राम और लक्ष्मण को मुक्त कराया था।

पाताल लोक से पुन: लंका आने के लिए उन्होंने राम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर बैठा लिया था और आकाश में उड़ते हुए सैकड़ों किलोमीटर का सफर चंद मिनटों में तय कर लिया था। ऐसे में सवाल उठता है कि जब वे लंका में राम का संदेश लेकर सीता माता के पास गए थे तो वे सीता को कंधे पर बैठाकर लंका से वापस नहीं ला सकते थे? जबकि उन्होंने इस दौरान वहां रावण के पुत्र अक्षय कुमार को मारा, मेघनाद से युद्ध किया, रावण का घमंड तोड़ा और लंकादहन कर रावण को खुली चुनौती देकर वापस भारत आ गए थे तो क्यों नहीं सीता माता को लेकर आए।

सीताजी को अशोक वाटिका में दुखी और प्रताड़ित बैठे देखकर हनुमानजी के मन में दु:ख उत्पन्न हुआ। उन्होंने सीता माता के समक्ष लघु रूप में उपस्थित होकर नमन किया और श्रीराम की अंगूठी रखी और कहा- 'हे माता जानकी, मैं श्रीरामजी का दूत हूं। करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूं, यह अंगूठी मैं ही लाया हूं। श्रीरामजी ने मुझे आपके लिए यह सहिदानी (निशानी या पहचान) दी है।'


हनुमानजी के प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया कि यह अंगूठी नकली नहीं है और यह नन्हा-सा वानर कोई राक्षसरूप नहीं है। उन्होंने जान लिया कि यह वानर मन, वचन और कर्म से कृपासागर श्रीरघुनाथजी का दास है, लेकिन न मालूम कि यह यहां कैसे आ गया? इसे तनिक भी डर नहीं है राक्षसों का क्या?

 हनुमान ने कहा- 'हे माता, मेरे लिए राक्षस और दानवों का कोई मूल्य नहीं। मैं चाहूं तो आपको अभी तत्क्षण राम के समक्ष ले चलूं लेकिन मुझे इसकी आज्ञा नहीं है।'

'हे माता! मैं आपको अभी यहां से लिवा ले जाऊं, पर श्रीरामचन्द्रजी की शपथ है। मुझे प्रभु (राम) की आज्ञा नहीं है। अतः हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरों सहित यहां आएंगे।

हनुमानजी ने कहा- श्रीरामचन्द्रजी यहां आएंगे और राक्षसों को मारकर आपको ले जाएंगे। नारद आदि (ऋषि-मुनि) तीनों लोकों में उनका यश गाएंगे। तब सीताजी ने कहा- 'हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान नन्हे-नन्हे-से होंगे। राक्षस तो बड़े बलवान, शक्तिशाली, मायावी और योद्धा हैं, तो यह कैसे होगा संभव?'

सीताजी ने कहा- 'हे वानर पुत्र, मेरे हृदय में बड़ा भारी संदेह होता है कि तुम जैसे बंदर कैसे समुद्र पार करेंगे और कैसे राक्षसों को हरा पाएंगे?'

यह सुनकर हनुमानजी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का अत्यंत विशाल शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत बलवान और वीर था।

तब विराट रूप को देखकर सीताजी के मन में विश्वास हुआ। हनुमानजी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया और सीता माता ने अजर अमर होने का वरदान ओर फल खाने की आज्ञा दी।

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥

भावार्थ:-हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्री रघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान्‌जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए॥